Tuesday, February 13, 2018

सत्यम शिवम सुंदरम

डॊ. सौरभ मालवीय
सत्य ही शिव है, शिव ही सुंदर है. भगवान शिव को देवों का देव महादेव भी कहा जाता है। भगवान शिव को आदि गुरु माना जाता है। भगवान शिव की आराधना का मूल मंत्र तो ऊं नम: शिवाय ही है, परंतु इस मंत्र के अतिरिक्त भी कुछ मंत्र हैं, जिनके जाप से भोले शंकर प्रसन्न हो जाते हैं। शिवरात्रि हिन्दुओं विशेषकर शिव भक्तों का प्रमुख त्योहार है। शिव रात्रि भगवान शिव को अतिप्रिय है। शिव पुराण के ईशान संहिता के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में आदिदेव भगवान शिव करोड़ों सूर्यों के समान प्रभाव वाले लिंग रूप में प्रकट हुए थे-
फाल्गुनकृष्णचतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि। शिवलिंगतयोद्भूत: कोटिसूर्यसमप्रभ:॥
मानयता यह भी है कि इसी दिन प्रलय आएगा, जब प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से नष्ट कर देंगे। इसीलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि भी कहा जाता है।

वर्ष में 12 शिवरात्रियां आती हैं। इनमें महाशिवरात्रि की सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। महाशिवरात्रि का पावन पर्व फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार अग्निलिंग के उदय के साथ इसी दिन सृष्टि का प्रारंभ हुआ था। यह भी मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव का विवाह देवी पार्वती के साथ सम्पन्न हुआ था। कहा जाता है कि महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव ने कालकूट नामक विष को अपने कंठ में रख लिया था, जो समुद्र मंथन के समय समुद्र से निकला था। इससे शिवशंकर का कंठ नीला हो गया था. इसीलिए उन्हें नीलकंठ नाम से भी जाना जाता है. शैव परंपरा की एक पौराणिक कथा के अनुसार, इस रात भगवान शिव ने संरक्षण और विनाश के स्वर्गीय नृत्य का सृजन किया था.

महाशिवरात्रि से संबंधित कई पौराणिक कथाएं हैं. एक कथा के अनुसार चित्रभानु नामक एक शिकारी था. वह वन्य पशुओं का शिकार करके अपना जीवन यापन करता था. एक बार महाशिवरात्रि के दिन अनजाने में उसने शिवकथा सुन ली. इसके बाद वह शिकार की खोज में वन में गया. वह बेल के वृक्ष के ऊपर चढ़कर शिकार की प्रतीक्षा करने लगा और अनजाने में बेल के पत्ते तोड़कर नीचे  फेंकने लगा. वृक्ष के नीचे घास-फूंस से ढका एक शिवलिंग था. बेलपत्र शिवलिंग पर गिरते रहे. इससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसका ह्रदय निर्मल बना दिया. उसके मन से हिंसा के विचार समाप्त हो गया. वह वन में शिकार करने गया था, परंतु उसने चार हिरणों को जीवनदान दे दिया. इसके बाद उसके जीवन में परिवर्तन आ गया. यह कथा अहिंसा पर की शिक्षा देती है.

मान्यता है कि शिवरात्रि को ग्रहों की विशेष स्थिति होती है. इसके कारण मानव शरीर में ऊर्जा का एक शक्तिशाली पुंज प्रवेश करता है. इसलिए इस रात्रि में जागरण करना बहुत उत्तम माना गया है. इसी कारण शिवरात्रि के पर्व का उत्सव एक दिन पहले से ही प्रारंभ हो जाता है. भगवान शिव के मंदिरों में पूरी रात पूजा-अर्चना की जाती है. भक्तजन रात्रिभर कीर्तन करते हैं.  भक्तजन सूर्योदय के समय पवित्र स्थानों पर स्नान करते हैं. नदी किनारों पर भक्तों का तांता लग जाता है. स्नान के बाद भगवान शिव के मंदिरों में पूजा-अर्चना की जाती है. भक्त शिवलिंग की परिक्रमा करते हैं और फिर भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है। भक्तजन शिवलिंग का जलाभिषेक या दुग्धाभिषेक करते हैं. शिवलिंग पर जल से जो अभिषेक जाता है, उसे जलाभिषेक कहा जाता है. इसी प्रकार शिवलिंग पर दूध से जो अभिषेक किया जाता है, उसे दुग्‍धाभिषेक  कहते हैं. शहद से भी अभिषेक किया जाता है. इसके अतिरिक्त शिवलिंग पर सिंदूर लगाया जाता है. सुगंधित धूप जलाई जाती है. दीपक जलाता जाता है. फल, अन्न और धन चढ़ाया जाता है. बेल पत्र और पान के पत्ते अर्पित किए जाते हैं. इनके अतिरिक्त वे वस्तुएं भी भगवान शिव को अर्पित करना चाहिए, जो उन्हें प्रिय हैं. धतूरा और धतूरे के पुष्प भगवान शिव को प्रिय हैं. मुक्तिदायिनी गंगा के जल का भी विशेष महत्व है, क्योंकि  गंगा देवलोक से भगवान श‌िव की जटा से होकर ही पृथ्वी लोक में उतरी हैं. इसील‌िए सभी नद‌ियों में गंगा का स्थान सर्वोपरि माना जाता है। भक्तजन महाशिवरात्रि के दिन उपवास भी रखते हैं. कुछ लोग निर्जल रहकर भी उपवास करते हैं. कई स्थानों पर इस दिन भगवान शिव की बारात भी निकाली जाती है. इसमें कलाकार शिव-पार्वती का रूप धारण करते हैं. भक्तजन इसमें बढ़ चढ़कर भाग लेते हैं. शिवरात्रि का महिलाओं के लिए विशेष महत्व है। विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और सुखी जीवन के लिए प्रार्थना करती हैं, जबकि अविवाहित लड़कियां भगवान शिव से अपने लिए सुयोग्य वर मांगती हैं. भगवान शिव को आदर्श पति के रूप में माना जाता है. लड़कियां सुयोग्य वर के लिए सोलह सोमवार का व्रत भी करती हैं.

महाशिवरात्रि पर ज्योतिर्लिंग पर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंग अर्थात प्रकाश के लिंग हैं. ये स्वयम्भू के रूप में जाने जाते हैं, जिसका अर्थ है स्वयं उत्पन्न। इनमें गुजरात के काठियावाड़ में स्थापित सोमनाथ शिवलिंग, मद्रास में कृष्णा नदी के किनारे पर्वत पर स्थापित श्री शैल मल्लिकार्जुन शिवलिंग, मध्यप्रदेश के उज्जैन के अवंति नगर में स्थापित महाकालेश्वर शिवलिंग, मध्यप्रदेश के ही ओंकारेश्वर में नर्मदा तट पर स्थापित ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग, गुजरात के द्वारकाधाम के निकट स्थापित नागेश्वर ज्योतिर्लिंग, बिहार के बैद्यनाथ धाम में स्थापित शिवलिंग, महाराष्ट्र की भीमा नदी के किनारे स्थापित भीमशंकर ज्योतिर्लिंग, महाराष्ट्र के नासिक के समीप त्र्यंम्बकेश्वर में स्थापित ज्योतिर्लिंग, महाराष्ट्र के ही औरंगाबाद जिले में एलोरा गुफा के समीप वेसल गांव में स्थापित घुमेश्वर ज्योतिर्लिंग, उत्तराखंड में हिमालय का दुर्गम केदारनाथ ज्योतिर्लिंग, उत्तर प्रदेश के काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग एवं मद्रास में रामेश्वरम्‌ त्रिचनापल्ली समुद्र तट पर भगवान श्रीराम द्वारा स्थापित रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग  सम्मिलित हैं.

भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में भी शिवरात्रि का पर्व हर्षोल्लास से मनाया जाता है. त्योहार मनुष्य को पुण्य कर्मो की शिक्षा देते हैं. हमें समाज के हित के कार्य करने चाहिए. अपने सामर्थ्य के अनुसार मानव कल्याण के लिए अपना योगदान सबको देना चाहिए.

Sunday, February 11, 2018

भावी भारत, युवा और पंडित दीनदयाल उपध्याय


डॉ. सौरभ मालवीय
1947 में जब देश स्वतंत्र हुआ तो देश के सामने उसके स्वरूप की महत्वपूर्ण चुनौती थी कि अंग्रेजों के जाने बाद देश का स्वरूप क्या होगा। कॉंग्रेसी नेता सहित उस समय के अधिकांश समकालीन विद्वानों का यही मानना था कि अंग्र्रेजों के जाने के बाद देश अपना स्वरूप स्वतः तय कर लेगा, अर्थात तत्कालीन नेताओं जेहन में देश के स्वरूप से अधिक चिंता अंग्र्रेजों के जाने को लेकर था, राष्ट्र के स्वरूप को लेकर गॉंधी जी के बाद अगर किसी ने सर्वाधिक चिंता या विचार प्रकट किये, उनमें श्यामाप्रसाद मखर्जी के अलावा पं. दीनदयाल उपध्याय का नाम उन चुनिन्दे चिंतकों में शामिल था, जो आजादी मिलने के साथ ही देश का स्वरूप भारतीय परिवेश, परिस्थिति और सांस्कृतिक, आर्थिक मान्यता के अनुरूप करना चाहते थे। वे इस कार्य में पश्चिम के दर्शन और विचार को प्रमुख मानने के वजाए सहयोगी भूमिका तक ही सीमित करना चाहते थे, जबकि तत्कालीन प्रमुख नेता और प्रथम प्रधानमंत्री पं.नेहरू पश्चिमी खाके में ही राष्ट्र का ताना-बाना बुनना चहते थे।
अगर हम गॉंधीजी और दीनदयाल जी के विचारों के निर्मेष भाव से विवेचना करें तो दोनों नेता राष्ट्र के अंतिम व्यक्ति के अभ्युदय और उत्थान में ही उसका वास्तविक विकास मानते थे। हालांकि दोनों के दृष्टिकोंण में या इसके लिए अपनाये जाने वाले साधनों और दर्शन तत्त्वों में मूलभूत विभेद भी था। दीनदयाल जी इस राष्ट्र नव-जागरण में युवाओं की भूमिका को भी महत्त्वपूर्ण मानते थे। उनका मानना था कि किसी राष्ट्र का स्वरूप उसके युवा ही तय करते हैं। किसी राष्ट्र को जानना हो तो सर्वप्रथम राष्ट्र के युवा को जानना चाहिए। पथभ्रष्ट और विचलित युवाओं का साम्राज्य खड़ा करके कभी कोई राष्ट्र अपना चिरकालिक सांस्कृतिक स्वरूप ग्रहण नहीं कर सकता। दीनदयाल जी की दृष्टि में युवा राष्ट्र की थाती है, एवं युवा-युवा के बीच भेद नहीं करता वह समग्र युवाओं को राष्ट्र की थाती मानता है। राष्ट्र जीवंत और प्राणवान सांस्कृतिक अवधारणा है। पण्डित जी राष्ट्र को जल, जंगल, जमीन का सिर्फ समन्वय नहीं मानते थे।
राष्ट्र और युवा के सम्बन्ध में दीनदयाल जी की मान्यता थी कि राष्ट्र का वास्तविक विकास सिर्फ उसके द्वारा ओद्योगिक जाना, और बड़े पैमाने पर किया गया पूॅंजी निवेश मात्र नहीं है। उनका स्पष्ट मानना था कि किसी राष्ट्र का सम्पूर्ण और समग्र विकास तब तक नहीं जब तक कि राष्ट्र का युवा सुशिक्षित और सुसंस्कृत नहीं होगा। सुसंस्कृत से पण्डित जी का आशय सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान तक नहीं था, बल्कि वह ऐसी युवा शक्ति निर्माण की बात करते थे जो राष्ट्र की मिट्टी और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ाव महसूस करता हो, उनके अनुसार यह तब तक सम्भव नहीं था, जब तक युवा, देश की संस्कृति और उसकी बहुलतावादी सोच मंे राष्ट्र की समग्रता का दर्शन न करता हो। अगर इसे हम भारत जैसे बहुलवादी राष्ट्र के संदर्भ में देखें तो ज्ञात होगा कि उसकी सांस्कृतिक बहुलता में भी एक समग्र संस्कृति का बोध होता है। जो उसे अनेकता में भी एकता के सूत्र में पिरोये रखने की ताकत रखता है। यही वह धागा है, जिसने सहस्त्रों विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण के बाद भी राष्ट्र को कभी विखंडित नहीं होने दिया, और एक सूत्र में पिरोए रखा।
पश्चिमी दार्शनिक मनुष्य के सिर्फ शारीरिक और मानसिक विकास की बात करते हैं। वहीं अधिकांश भारतीय दार्शनिक व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक विकास के साथ ही धार्मिक विकास पर भी जोर देते हैं। पण्डित दीनदयाल उपाध्याय एकात्म मानव दर्शन की बाद करते हैं, तो उनका भी आशय यही होता है कि पूर्ण मानव बनना तभी सम्भव है, जब मनुष्य का शारीरिक और बौद्धिक विकास के साथ-साथ उसका अध्यात्मिक विकास भी हो। इस एकात्म मानव दर्शन में व्यष्टि से समष्टि तक सब एक ही सूत्र में गुंथित है युवा व्यक्तित्व का विकास होगा तो समाज विकसित होगा, समाज विकसित होगा तो राष्ट्र तो राष्ट्र की उन्नति होगी, और राष्ट्र की उन्नति होगी तो विश्व का कल्याण होगा। राष्ट्र के सम्बन्ध में दीनदयाल जी का विचार था कि जब एक मानव समुदाय के समक्ष, एक वृत्त-विचार आदर्श रहता है और वह समुदाय किसी भूमि विशेष को मातृ भाव से देखता है तो वह राष्ट्र कहलाता है, अर्थात पण्डित जी के अनुसार देश के युवा राष्ट्र के सच्चे सपूत तभी कहलायेंगे जब वे भारत मॉं को मातृ जमीन का टुकड़ा न समझें, बल्कि उसे सांस्कृतिक मॉं के रूप में स्वीकार करें। उनका विचार था कि राष्ट्र की भी एक आत्मा होती है जिसे चिती रूप में जाना जाता है।
प्रसिद्ध विद्वान मैक्डूगल के अनुसार किसी भी समूह की एक मूल प्रवृत्ति होती है, वैसे ही चिती किसी समाज की मूल प्रवृत्ति है जो जन्मजात है, और उसके होने का कारण ऐतिहासिक नहीं है। इसी क्रम में वर्तमान परिप्रेक्ष्य के भौतिकवादी स्वरूप को देखते हुए एवं युवाओंे के मौजूदा स्थिति और स्वभाव के बारे में चिंता प्रकट करते हुए एक बार अपने उद्बोधन में पण्डित दीनदयाल जी कहा था कि किसी भी राष्ट्र का युवा का इस कदर भौतिकवादी होना और राष्ट्र राज्य के प्रति उदासीन होना अत्यन्त घातक है। दीनदयाल जी का युवाओं के लिए चिंतन था कि भारत जैसा विशाल एवं सर्वसम्पन्न राष्ट्र जिसने अपनी ऐतिहासिक तथा सांस्कृति पृष्ठभूमि के आधार पर सम्पूर्ण विश्व को अपने ज्ञान पुंज के आलोकित कर मानवता का पाठ पढ़ाया तथा विश्व में जगत गुरू के पद पर प्रतिष्ठापित हुआ। ऐसे विशाल राष्ट्र के पराधीनता के कारणों पर दीनदयाल जी का विचार और स्वाधीनता पश्चात समर्थ सशक्त भारत बनाने में युवाओं के योगदान को महत्त्वपूर्ण माना है।
पं. दीनदयाल उपध्याय के मन में जो मानवता के प्रति विचार थेए उसे गति 1920 में प्रकाशित पण्डित बद्रीशाह कुलधारिया की पुस्तक ‘दैशिक शास्त्रश् से मिली। दैशिक शास्त्र की भावभूमि तो दीनदयाल जी के मन में पहले से ही थी और एक नया विचार उनके मन में उदित हुआ कि सम्पूर्ण विश्व का प्रतिनिधित्व युवा ही करते हैं द्य अतः युवाओं के विचारों का अध्ययन करके मानवता के लिए एक शास्वत जीवन प्रणाली दी जाएए जो कि युवाओं के लिए प्रेरक तो ही साथ ही साथ युवाओं के माध्यम से भारत एक वैश्विक शक्ति बन सके।

मानवता के कल्याण का विचार है एकात्म मानवदर्शन

डॉ. सौरभ मालवीय
मनुष्य विचारों का पुंज होता है और सर्व प्रथम मनुष्य के चित्त में विचार ही  उभरता है। वही विचार घनीभूत होकर संस्कार बनते है और मनुष्य के कर्म रूप में परिणीति हो कर व्यष्टि और समष्टि सबके हित का कारक बनते है।  यदि विचारों की परिपक्वता अपूर्ण रह गई तो परिणाम विपरीत होने लगतेहै।  भारतीय महर्षियों ने विचारों की अनन्त उचाई छूने का प्रयास किया और इस विचार यात्रा में पाया गया कि सबसे उत्तम धर्म वही होगा जिसमें मनुष्यों के खिलने की समग्र संभावनाओं के द्वार खुले हो जिसे जो होना है वह हो और दूसरे के होने में बाधक न हो वल्कि साधक हो।  इस प्रकार के सः अस्तित्व की विचार सारणी इस धरा-धाम पर सबकी संभावनाओं के द्वार खोलती है। और इस प्रक्रिया में टकराहट की कल्पना भी नही सः अस्तित्व सहज धर्म बन जाता है और सूत्रवद्धता सबके मूल में स्थापित हो जाती है।
ऋषियों की यह चिंतन शैली भारत के जन मन में घुल हुआ है,भारत की मानसिकता इसी प्रकार के समग्र सोच पर विकसित है।  परोपकार ,अहिंसा ,करुणा ,क्षमा,दया ,आर्जव ,मृदुता,प्रतिभा इत्यादि अनेको प्रकार के फल इसी चिंतन वृक्ष पर सदियों से सदाबहार रूप में लदे रहते है। लम्बे गुलामी के कारण हमारी चिंतन धारा में भी गतिरोध पैदा हुआ और उस जीवन वृक्ष से नवीन सपने ढहता गया।  इस दौरान एक अपूर्ण विचार भी हम पर थोपने का प्रयास हुआ. सामान्यतः ऐसा होता ही है बिजेता चाहे जितना भी पतित विचार या जीवन शैली का हो अपनी उन चिंजो को विजितों पर लादता ही है उसी में कुछ चाटुकार वृति के लोग विजेताओं के इस नए धर्म का गला फाडू स्वागत करने लगते है पश्चिम के चिंतको में एक अत्यंत ही प्रमुख नाम रेन्डेकार्ट ने यहाँ तक घोषणा कर दिया कि ईश्वर मर गया है विश्व में ईश्वर नाम को कोई चीज ही नहीं है।  फेडरिकमित्से,कारलायल आदि विचारकों ने खण्डसह सोच को प्राथमिकता दी उनके कारण यह चिंतन ही पैदा नहीं हो पाया कि प्रकृति में कही एक सूत्रता भी है इस विचार ने अपनी पूरी ऊर्जा यह बताने में लगा दिया की व्यक्ति और समाज दो है। साधन और साध्य दो है।  सृष्टि और परमेष्ठी दो है।  देश और राष्ट्र दो है।  राष्ट्र और विश्व दो है इत्यादि।  इन द्वंदों के बीच वो यह भी कहते गए कि इनके लक्ष्य पूर्ति में विरोधाभाष भी है।  इस तरह के अपूर्ण चिंतन शैली का भयंकर परिणाम यह हुआ की हीगेल नाम के विचारक ने यह विचार दिया की आगे बढे हुए लोग अनैतिक हो जाते है जो पीछे वालों की नैक्तिक्ता पर पलते है इसी प्रकार की अपूर्ण शैली पर कार्ल मार्क्स ने बुजुर्वा और सर्वहारा शब्द गढ़े। उन्मादी मानसिकता के इस सोच ने विश्व में राष्ट्र ,परिवार ,ग़ाँव ,देश इत्यादि संस्थाओ और भावनात्मक सम्वन्धों को मिटा कर एक नई रेखा खीचंनी शुरू की लगभग ६० वर्षो के भीतर अधिक से अधिक धरती को अपनी छतरी के नीचें ढका लेकिन क्या परिणाम हुआ ये सारे के सारे देश टूट गए वहा का समाज जीवन नष्ट भ्रस्ट हो गया वे लोग अब पेरोस्ट्राइका और ग्लासमोस्ट की छाँव खोज रहे है।

एक दूसरी विचार शैली ने पूंजीवाद का एक ऐसा नँगा रूप खड़ा कर दिया की वहा हर व्यक्ति एक दूसरे को ग्राहक समझने लगा हर आदमी अपने मॉल  बढ़िया बता कर हर दूसरे को बेचा रहा है भले ही उसकी कोई सार्थकता न हो।  इस भयंकर परिस्थिति में यह सोचने का विषय है कि मनुष्य केवल व्यापारिक सम्बन्धो के कारण जी रह है या मनुष्य का बल पूंजी है ? क्या मनुष्य केवल रोटी है ?  जब इसकी जड़ो की ओर हम जाते है तो दिखाई देता है कि यह ओरिजिन ऑफ़ स्पेसिज तथा स्पेंसर वे तीन जीवन दिखाई देते है जिसमे कहा गया है कि सर्वाइकल ऑफ फिटेस्ट ,एक्सपोलाइटेशन ऑफ़ नेचर और स्ट्रिगल फार एजिस्टेंस ही मूल है यह बितण्डावाद इतना गहरा हो गया है की पूरा विश्व ही त्राहिमाम कर रहा है।  युग पुरुष महामनीषी पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने सन १९६२ में श्री बद्रीशाह कुलधारिया की एक पुस्तक दैशिकशास्त्र पढ़ा पंडित जी ने दैशिकशास्त्र के जीवन मूल्यों के गुण सूत्र तो लाखो साल पुरानी परम्परा से चली आरहे श्री बद्रीशाह के अमृत वर्षा ने जीवन मूल्यों को फलने फूलने का अवसर दिया उसी शुभअवसर का अमृत फल एकात्म मानव दर्शन है।  जिसमे मनुष्य के परम स्वातंत्रय की घोषण है इस महामंत्र को पंडित जी ने सन १९६४ में मुंबई के भारतीय जनसंघ के अधिवेशन में प्रस्तुत किया था।  इस एकात्म मानव दर्शन में व्यष्टि से समष्टि तक सब एक ही सूत्र में गुंथित है व्यक्ति का विकास हो तो समाज विकसित होगा समाज विकसित होगा तो राष्ट्र की उन्नति होगी राष्ट्र के उन्नति से विश्व का कल्याण होगा।  इस सूत्र को पंडित दीनदयाल जी ने श्रीमदभागवत से ग्रहण किया था जिसकी मूल धारणा स्ट्रिगल फार एजिस्टेंस नहीं वल्कि अस्तित्व के लिए सहयोग है।  उपनिषदों से किये हुए अमृत ने पंडित जी ने कहा कि जीवन उपभोग नहीं वल्कि तेन भुञ्जितः है सम्पूर्ण विश्व सुखी होगा।  सर्वाइकल ऑफ़ फिटेस्ट यह जीवन मंत्र नहीं हो सकता अपितु सबका सहयोग और सबका विकास जीवन दृष्टि है। ,एक्सपोलाइटेशन ऑफ़ नेचर यह पूरी तरह से मानव जाती को डूबा देगा।  जब की एकात्म मानव दर्शन के प्रणेता दीनदयाल जी कहते है प्रकृति के सहयोग से अपना अस्तित्व बचाये रख सकते है प्रकृति गाय है गाय हमारी माता है हम उस माँ का दूध पिएंगे तो हम भी सुखी और स्वास्थ्य रहेंगे और प्रकृति माँ भी सुखी रहेंगी लेकिन यदि गाय का खून पिएंगे तो गाय भी मर जाएगी और हम भी मर जायेंगे।  यह उच्चतम मूल्य पूरी दृष्टि से हमें एकात्म हो जाने की प्रेरणा देती है यही एकात्म मानव दर्शन है जो इस धरती को एक नई दिशा देगा और सबका कल्याण होगा।

Wednesday, January 24, 2018

पत्रकारिता के विद्यार्थियों के साथ







Zee हिंदुस्तान के संपादक Brajesh Kumar Singh डॉ श्याम प्रसाद मुखर्जी फाउंडेशन के निदेशक डॉ . Anirban Ganguly श्री शिवानन्द द्विवेदी।

Sunday, January 21, 2018

वसंतोत्सव : प्रेम का पर्व


डॊ. सौरभ मालवीय
प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में ऋतुओं का विशेष महत्व रहा है. इन ऋतुओं ने विभिन्न प्रकार से हमारे जीवन को प्रभावित किया है. ये हमारे जन-जीवन से गहरे से जुड़ी हुई हैं. इनका अपना धार्मिक और पौराणिक महत्व है. वसंत ऋतु का भी अपना ही महत्व है. भारत की संस्कृति प्रेममय रही है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण वसंत पंचमी का पावन पर्व है. वसंत पंचमी को वसंतोत्सव और मदनोत्सव भी कहा जाता है. प्राचीन काल में स्त्रियां इस दिन अपने पति की कामदेव के रूप में पूजा करती थीं, क्योंकि इसी दिन कामदेव और रति ने सर्वप्रथम मानव हृदय में प्रेम और आकर्षण का संचार किया था. यही प्रेम और आकर्षण दोनों के अटूट संबंध का आधार बना, संतानोत्पत्ति का माध्यम बना.
वसंत पंचमी का पर्व माघ मास में शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन मनाया जाता है, इसलिए इसे वसंत पंचमी कहा जाता है. इस दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा-अर्चना की जाती है. भारत सहित कई देशों में यह पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. इस दिन घरों में पीले चावल बनाए जाते हैं, पीले फूलों से देवी सरस्वती की पूजा की जाती है. महिलाएं पीले कपड़े पहनती हैं. बच्चे पीली पतंगे उड़ाते हैं. विद्या के प्रारंभ के लिए ये दिन शुभ माना जाता है. कलाकारों के लिए इस दिन का विशेष मह्त्व है.
प्राचीन भारत में पूरे वर्ष को जिन छह ऋतुओं में विभाजित किया जाता था, उनमें वसंत जनमानस की प्रिय ऋतु थी. इसे मधुमास भी कहा जाता है. इस दौरान सूर्य कुंभ राशि में प्रवेश कर लेता है. इस ऋतु में खेतों में फ़सलें पकने लगती हैं, वृक्षों पर नये पत्ते आ जाते हैं. आम पर की शाख़ों पर बौर आ जाता है. उपवनों में रंग-बिरंगे पुष्प खिलने लगते हैं. चहुंओर बहार ही बहार होती है. रंग-बिरंगी तितलियां वातावरण को और अधिक सुंदर बना देती हैं.
वसंत का धार्मिक महत्व भी है. वसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए माघ मास के पांचवे दिन महोत्सव का आयोजन किया जाता था. इस उत्सव में भगवान विष्णु और कामदेव की पूजा होती थी. शास्त्रों में वसंत पंचमी को ऋषि पंचमी से उल्लेखित किया गया है, तो पुराणों-शास्त्रों तथा अनेक काव्यग्रंथों में भी अलग-अलग ढंग से इसका चित्रण मिलता है. मान्यता है कि सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने जीवों की रचना की, परंतु इससे वे संतुष्ट नहीं थे. भगवान विष्णु ने अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री प्रकट हुई, जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था. अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी. ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया. जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, वैसे ही संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई. जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया. पवन चलने से सरसराहट होने लगी. तब ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती के नाम से पुकारा. सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है. वे विद्या और बुद्धि प्रदान करती हैं. संगीत की उत्पत्ति करने के कारण वे संगीत की देवी कहलाईं. वसंत पंचमी को उनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं. ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए उल्लेख गया है-
प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु।
अर्थात ये परम चेतना हैं. सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं. हममें जो आचार और मेधा है, उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं. इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है.
मान्यता है कि वसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती पूजा करने और व्रत रखने से वाणी मधुर होती है, स्मरण शक्ति तीव्र होती है, प्राणियों को सौभाग्य प्राप्त होता है तथा विद्या में कुशलता प्राप्त होती है.
"यथा वु देवि भगवान ब्रह्मा लोकपितामहः।
त्वां परित्यज्य नो तिष्ठंन, तथा भव वरप्रदा।।
वेद शास्त्राणि सर्वाणि नृत्य गीतादिकं चरेत्।
वादितं यत् त्वया देवि तथा मे सन्तुसिद्धयः।।
लक्ष्मीर्वेदवरा रिष्टिर्गौरी तुष्टिः प्रभामतिः।
एताभिः परिहत्तनुरिष्टाभिर्मा सरस्वति।।
अर्थात् देवी! जिस प्रकार लोकपितामह ब्रह्मा आपका कभी परित्याग नहीं करते, उसी प्रकार आप भी हमें वर दीजिए कि हमारा भी कभी अपने परिवार के लोगों से वियोग न हो. हे देवी! वेदादि सम्पूर्ण शास्त्र तथा नृत्य गीतादि जो भी विद्याएं हैं, वे सभी आपके अधिष्ठान में ही रहती हैं, वे सभी मुझे प्राप्त हों. हे भगवती सरस्वती देवी! आप अपनी- लक्ष्मी, मेधा, वरारिष्टि, गौरी, तुष्टि, प्रभा तथा मति- इन आठ मूर्तियों के द्वारा मेरी रक्षा करें.
पुराणों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने सरस्वती से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी. इस तरह भारत के कई हिस्सों में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा होने लगी. त्रेता युग में जिस दिन श्रीराम शबरी मां के आश्रम में पहुंचे थे, वह वसंत पंचमी का ही दिन था. श्रीराम ने भीलनी शबरी मां के झूठे बेर खाए थे. गुजरात के डांग जिले में जिस स्थान पर शबरी मां के आश्रम था, वहां आज भी एक शिला है. लोग इस शिला की पूजा-अर्चना करते हैं. बताया जाता है कि श्रीराम यहीं आकर बैठे थे. इस स्थान पर शबरी माता का मंदिर भी है, जहां दूर-दूर से श्र्द्धालु आते हैं.
वसंत पंचमी के दिन मथुरा में दुर्वासा ऋषि के मंदिर पर मेला लगता है. सभी मंदिरों में उत्सव एवं भगवान के विशेष शृंगार होते हैं. वृंदावन के श्रीबांके बिहारीजी मंदिर में बसंती कक्ष खुलता है. शाह जी के मंदिर का बसंती कमरा प्रसिद्ध है. मंदिरों में वसंती भोग रखे जाते हैं और वसंत के राग गाये जाते हैं वसंम पंचमी से ही होली गाना शुरू हो जाता है. ब्रज का यह परम्परागत उत्सव है.
इस दिन हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के पौराणिक नगर पिहोवा में सरस्वती की विशेष पूजा-अर्चना होती है. पिहोवा को सरस्वती का नगर भी कहा जाता है, क्योंकि यहां प्राचीन समय से ही सरस्वती सरिता प्रवाहित होती रही है. सरस्वती सरिता के तट पर इस क्षेत्र में अनेक प्राचीन तीर्थ स्थल हैं. यहां सरस्वती सरिता के तट पर विश्वामित्र जी ने गायत्री छंद की रचना की थी. पिहोवा का सबसे मुख्य तीर्थ सरस्वती घाट है, जहां सरस्वती नदी बहती है. यहां देवी सरस्वती का अति प्राचीन मंदिर है. इन प्राचीन मंदिरों में देशभर के श्रद्धालु आते हैं. यहां भव्य शोभायात्रा निकलती है.
वसंत पंचमी का साहित्यिक महत्व भी है. इस दिन हिन्दी साहित्य की अमर विभूति महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का जन्मदिवस भी है. 28 फरवरी, 1899 को जिस दिन निराला जी का जन्म हुआ, उस दिन वसंत पंचमी ही थी. वंसत कवियों की अति प्रिय ऋतु रही है. कालजयी रचनाकार रवींद्रनाथ टैगोर ने वसंत ऋतु के महत्व को दर्शाते हुए लिखा है-
आओ आओ कहे वसंत धरती पर, लाओ कुछ गान प्रेमतान
लाओ नवयौवन की उमंग नवप्राण, उत्फुल्ल नई कामनाएं घरती पर
हिंदी साहित्य में छायावादी युग के महान स्तंभ सुमित्रानंदन पंत वसंत का मनोहारी वर्णन करते हुए कहते हैं-
चंचल पग दीपशिखा के धर
गृह मग वन में आया वसंत।
सुलगा फागुन का सूनापन
सौंदर्य शिखाओं में अनंत।
सौरभ की शीतल ज्वाला से
फैला उर-उर में मधुर दाह
आया वसंत भर पृथ्वी पर
स्वर्गिक सुंदरता का प्रवाह।
वसंत पंचमी हमारे जीवन में नव ऊर्जा का संचार करती है. ये निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है. जिस तरह वृक्ष पुराने पत्तों को त्याग कर नये पत्ते धारण करते हैं, ठीक उसी तरह हमें भी अपने अतीत के दुखों को त्याग कर आने वाले भविष्य के स्वप्न संजोने चाहिए.

संपर्क
डॉ. सौरभ मालवीय
सहायक प्राध्यापक
माखनलाल चतुर्वेदी
राष्‍ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल (मध्य प्रदेश)
मो. +919907890614
ईमेल : drsourabhmalviya@gmail.com

Friday, January 12, 2018

भाषण नहीं, तपस्या का सार था

डॊ. सौरभ मालवीय
धन्य   हैं  वो  लोग  जिनके  शरीर  दूसरों  की  सेवा  करने  में  नष्ट   हो  जाते  हैं। यह कथन वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु स्वामी विवेकानन्द का है। उन्होंने लगभग 125 वर्ष पूर्व 11 सितंबर 1893 को अमेरिका के शिकागो की धर्म संसद में ऐसा भाषण दिया था, जिसने समस्त विश्व के समक्ष भारत की गौरान्वित करने वाली छवि प्रस्तुत की थी। अपने भाषण में उन्होंने कई महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा था-
अमरीकी भाइयों और बहनों, आपने जिस सौहार्द और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया है, उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खड़े होते समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रहा है। संसार में संन्यासियों की सबसे प्राचीन परम्परा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूं, धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूं और सभी सम्प्रदायों एवं मतों के कोटि कोटि हिन्दुओं की ओर से भी धन्यवाद देता हूं।
मैं इस मंच पर से बोलने वाले उन कतिपय वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूं, जिन्होंने प्राची के प्रतिनिधियों का उल्लेख करते समय आपको यह बताया है कि सुदूर देशों के ये लोग सहिष्णुता का भाव विविध देशों में प्रचारित करने के गौरव का दावा कर सकते हैं। मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूं, जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृत- दोनों की ही शिक्षा दी हैं।
हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते वरन समस्त धर्मों को सच्चा मान कर स्वीकार करते हैं। मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है, जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है। मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता हैं कि हमने अपने वक्ष में उन यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट को स्थान दिया था, जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी जिस वर्ष उनका पवित्र मन्दिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया था।
ऐसे धर्म का अनुयायी होने में मैं गर्व का अनुभव करता हूं, जिसने महान जरथुष्ट जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी और जिसका पालन वह अब तक कर रहा है। भाइयो मैं आप लोगों को एक स्रोत की कुछ पंक्तियां सुनाता हूं, जिसकी आवृति मैं बचपन से कर रहा हूं और जिसकी आवृति प्रतिदिन लाखों मनुष्य किया करते हैं -
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम्। नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव॥
अर्थात जैसे विभिन्न नदियां भिन्न भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं उसी प्रकार हे प्रभो! भिन्न भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जानेवाले लोग अन्त में तुझमें ही आकर मिल जाते हैं।
यह सभा, जो अभी तक आयोजित सर्वश्रेष्ठ पवित्र सम्मेलनों में से एक है स्वतः ही गीता के इस अद्भुत उपदेश का प्रतिपादन एवं जगत के प्रति उसकी घोषणा करती है-
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥
अर्थात जो कोई मेरी ओर आता है-चाहे किसी प्रकार से हो-मैं उसको प्राप्त होता हूं। लोग भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुए अन्त में मेरी ही ओर आते हैं। साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी वीभत्स वंशधर धर्मान्धता इस सुन्दर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी हैं। वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही हैं व उसको बारम्बार मानवता के रक्त से नहलाती रही हैं, सभ्यताओं को ध्वस्त करती हुई पूरे के पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही हैं। यदि ये वीभत्स दानवी शक्तियां न होतीं तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता। पर अब उनका समय आ गया हैं और मैं आन्तरिक रूप से आशा करता हूं कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घंटा ध्वनि हुई है, वह समस्त धर्मान्धता का, तलवार या लेखनी के द्वारा होनेवाले सभी उत्पीड़नों का अंत करे।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शिकागो में स्वामी विवेकानंद के संबोधन की 125वीं वर्षगांठ पर आयोजित समारोह को संबोधित करते हुए
कहा था कि 11 सितंबर 1893 को शिकागो में स्वामी विवेकानंद का संबोधन मात्र भाषण नहीं था, बल्कि यह एक तपस्वी की तपस्या का सार था। वरना उस समय तो दुनिया में हमें सांप, संपेरों और जादू-टोना करने वालों के रूप में देखा जाता था। एकादशी को क्या खाएं, पूर्णिमा को क्या नहीं खाएं, इसी के लिए हमारी चर्चा होती थी।

उल्लेखनीय है कि 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता के कायस्थ परिवार में जन्मे स्वामी विवेकानन्द ने अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व कर उसे सार्वभौमिक पहचान दिलाई। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने उनके बारे में कहा था-"यदि आप भारत को जानना चाहते हैं, तो विवेकानन्द को पढ़िये। उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पाएंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं।"
स्वामी विवेकानन्द के बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। उनके पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता उच्च न्यायालय के एक प्रसिद्ध अधिवक्ता थे।  उनकी माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों की घरेलू महिला थीं। वह बाल्यावस्था से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। उनके घर में नियमपूर्वक प्रतिदिन पूजा-पाठ होता था। साथ ही नियमित रूप से भजन-कीर्तन भी होता रहता था। परिवार के धार्मिक वातावरण का उन पर भी प्रभाव गहरा पड़ा। वह वे अपने गुरु रामकृष्ण देव से अत्यधिक प्रभावित थे। उन्होंने अपने गुरु से ही यह ज्ञान प्राप्त किया कि समस्त जीव स्वयं परमात्मा का ही अंश हैं, इसलिए मानव जाति की सेवा द्वारा परमात्मा की भी सेवा की जा सकती है।

स्वामी विवेकानन्द के जन्म दिवस पर अर्थात 12 जनवरी को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। उल्लेखनीय है कि विश्व के अधिकांश देशों में कोई न कोई दिन युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णयानुसार वर्ष 1985 को अंतरराष्ट्रीय युवा वर्ष घोषित किया गया।  पहली बार वर्ष 2000 में अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस का आयोजन आरंभ किया गया था। संयुक्त राष्ट्र ने 17 दिसंबर 1999 को प्रत्येक वर्ष 12 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की थी। अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस मनाने का अर्थ है कि सरकार युवा के मुद्दों और उनकी बातों पर ध्यान आकर्षित करे। भारत में इसका प्रारंभ वर्ष 1985 से हुआ, जब सरकार ने स्वामी विवेकानन्द के जन्म दिवस पर अर्थात 12 जनवरी को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। युवा दिवस के रूप में स्वामी विवेकानन्द का जन्मदिवस चुनने के बारे में सरकार का विचार था कि स्वामी विवेकानन्द का दर्शन एवं उनका जीवन भारतीय युवकों के लिए प्रेरणा का बहुत बड़ा स्रोत हो सकता है।
स्वामी विवेकानंद ने युवाओं का आह्वान करते हुए कठोपनिषद का एक मंत्र कहा था-
 'उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।'
अर्थात उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक कि अपने लक्ष्य तक न पहुंच जाओ।'

युवा देश और समाज के जीवन मूल्यों के प्रतीक हैं। युवा देश और समाज को नए शिखर पर ले जाते हैं। युवा गहन ऊर्जा और उच्च महत्वकांक्षाओं से भरे हुए होते हैं। उनकी आंखों में भविष्य के इंद्रधनुषी स्वप्न होते हैं। समाज को बेहतर बनाने और राष्ट्र के निर्माण में सर्वाधिक योगदान युवाओं का ही होता है। देश के स्वतंत्रता आंदोलन में युवाओं ने अपनी शक्ति का परिचय दिया था। युवाओं के उचित मार्गदर्शन के लिए अति आवश्यक है कि उनकी क्षमता का सदुपयोग किया जाए। उनकी सेवाओं को प्रौढ़ शिक्षा तथा अन्य सराकारी योजनाओं के तहत चलाए जा रहे अभियानों में प्रयुक्त किया जा सकता है। वे सरकार द्वारा सुनिश्चित लक्ष्यों की प्राप्ति के दायित्व को वहन कर सकते हैं। तस्करी, काला बाजारी, जमाखोरी जैसे अपराधों पर अंकुश लगाने में उनकी सेवाएं ली जा सकती हैं। युवाओं को राष्ट्र निर्माण के कार्य में लगाया जाए। राष्ट्र निर्माण का कार्य सरल नहीं है। यह दुष्कर कार्य है। इसे एक साथ और एक ही समय में पूर्ण नहीं किया जा सकता। यह चरणबद्ध कार्य है। इसे चरणों में विभाजित किया जा सकता है। युवा इस श्रेष्ठ कार्य में अपनी क्षमता और योग्यता के अनुसार भाग ले सकते हैं। ऐसी असंख्य योजनाएं, परियोजनां और कार्यक्रम हैं, जिनमें युवाओं की सहभागिता सुनिश्चत की जा सकती है। युवा समाज में समाजिक, आर्थिक और नवनिर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। वे समाज में प्रचलित कुप्रथाओं और अंधविश्वास को समाप्त करने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। देश में दहेज प्रथा के कारण न जाने कितनी ही महिलाओं पर अत्याचार किए जाते हैं, यहां तक कि उनकी हत्या तक कर दी जाती है। महिलाओं के प्रति यौन हिंसा से तो देश त्रस्त है। नब्बे साल की वॄद्धाओं से लेकर कुछ दिन की मासूम बच्चियों तक से दुष्कर्म कर उनकी हत्या कर दी जाती है। डायन प्रथा के नाम पर महिलाओं की हत्याएं होती रहती हैं। अंधविश्वास में जकड़े लोग नरबलि तक दे डालते हैं। समाज में छुआछूत, ऊंच-नीच और जात-पांत की खाई भी बहुत गहरी है। दलितों विशेषकर महिलाओं के साथ अमानवीयता व्यवहार की घटनाएं भी आए दिन देखने और सुनने को मिलती रहती हैं, जो सभ्य समाज के माथे पर कलंक समान हैं। आतंकवाद के प्रति भी युवाओं में जागृति पैदा करने की आवश्यकता है। भविष्य में देश की लगातार बढ़ती जनसंख्या का पेट भरने के लिए अधिक खाद्यान्न की आवश्यकता होगी। कृषि में उत्पादन के स्तर को उन्नत करने से संबंधित योजनाओं में युवाओं को लगाया जा सकता है। इससे जहां युवाओं को रोजगार मिलेगा, वहीं देश और समाज हित में उनका योगदान रहेगा।

Wednesday, January 3, 2018

एक वरदान है पुस्तक मेला

डॊ. सौरभ मालवीय
देश की राजधानी दिल्ली के प्रगति मैदान में 6 जनवरी से 14 जनवरी तक विश्व पुस्तक मेला आयोजित किया जा रहा है। मेले का उद्घाटन मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडे़कर करेंगे। वर्ष 1972 में प्रथम विश्व पुस्तक मेले का आयोजन किया गया था। उस समय इसमें  200 प्रतिभागी सम्मिलित हुए थे। इसके बाद तो निरंतर पुस्तक मेले लगने लगे और इसमें सम्मिलित होने वाले प्रतिभागियों की संख्या भी बढ़ती गई। इस वर्ष देश भर से आने वाले प्रकाशकों की संख्या लभगभ 800 रहेगी। मेले में 30 विदेशी प्रकाशक भी भाग लेंगे। इस वर्ष यूरोपियन यूनियन को अतिथि देश के रूप में आमंत्रित किया गया है।

उल्लेखनीय है कि मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय द्वारा बनाई गई स्वायत्त संस्था राष्ट्रीय पुस्तक ट्रस्ट द्वारा इस मेले का आयोजन किया जाता है। यह संस्था पुस्तकों को बढ़ावा देने के लिए कार्यरत है। भारतीय व्यापार संवर्धन संगठन सह-संयोजक के रूप में इस मेले में सम्मिलित रहता है। इसे आईटीपीओ के नाम से भी जाना जाता है। यह भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय के तत्वावधान में कार्य करता है। यह देश के व्यापार और उद्योगों के विकास के लिए कार्य करता है। विश्व  पुस्तक मेले के आयोजन का मुख्य उद्देश्य लोगों में पुस्तकों के प्रति रुचि पैदा करना है। पुस्तक मेलों के कई लाभ हैं, इनसे जहां पाठकों को एक ही स्थान पर विभिन्न विषयों की हज़ारों पुस्तकें मिल जाती हैं, वहीं प्रकाशकों को भी अपनी पुस्तकें प्रस्तुत करने के लिए एक उचित मंच उपलब्ध हो जाता है। पुस्तक मेले में इतिहास, भूगोल, ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, यात्रा, धर्म, भाषा, जीवन-वृत्त, आत्मकथाएं, लोक कथाएं, मनोरंजन, सिनेमा, स्वास्थ्य, सिलाई-बुनाई-कढ़ाई  आदि सभी विषयों पर पुस्तकें मिल जाती हैं। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि कोई विषय ऐसा नहीं होता, जिस पर विश्व पुस्तक मेले में पुस्तक न मिले। मेले में प्रकाशक नई पुस्तकों का विमोचन भी करते हैं। वे लेखकों को बुलाते हैं, पाठकों से उनकी वार्तालाप कराते हैं। ऐसे में पाठकों को लेखकों से सीधी बात करने का अवसर प्राप्त होता है।  नये लेखक भी पुस्तक मेले का भरपूर लाभ उठाते हैं। वे मेले में आए विशिष्ट अतिथियों से अपनी पुस्तकों का विमोचन करा लेते हैं। इससे उनका और उनकी पुस्तकों का प्रचार भी हो जाता है।

विश्व पुस्तक मेले में देश ही नहीं, विश्व के अनेक देशों के प्रकाशन भी भाग लेते हैं। हर वर्ष मेले की एक थीम होती है। इससे उस विषय के प्रति, उस समस्या के प्रति लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया जाता है।  इस वर्ष की थीम ’वातावरण और जलवायु परिवर्तन’ है। प्रगति मैदान के हॉल नंबर-7 में थीम मंडप बनाया जाएगा। इसमें हर भारतीय भाषा में प्रकृति और प्रदूषण पर प्रकाशित पुस्तकों की प्रदर्शनी लगाई जाएगी। प्रसिद्ध नृत्यांगना सोनल मानसिंह की नृत्य नाटिका और गायिका मालिनी अवस्थी के लोक गीत भी पर्यावरण पर आधारित रहेंगे।

उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष 2017 में आयोजित होने वाले विश्व पुस्तक मेले की थीम महिलाओं पर महिलाओं द्वारा  लेखन था, जबकि वर्ष 2016 में आयोजित किए गए विश्व पुस्तक मेले की थीम ’विविधता’ थी। इस मेले में चीन को विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। चीन के प्रकाशकों ने भी मेले में अपने देश की पुस्तकें प्रस्तुत कीं, जिससे पाठकों चीनी पुस्तकें पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ।

निसंदेह पुस्तकें ज्ञान का भंडार हैं। पुस्त्कें अनमोल होती हैं। इनका कोई मोल नहीं होता। पुस्तकें हमारी सबसे अच्छी मित्र भी होती हैं। इनसे हमारा मार्ग प्रशस्त करती हैं, हमारा मार्गदर्शन करती हैं। शब्द ब्रह्मा हैं। पुस्तकों के माध्यम से महापुरुषों के विचार अमर हो जाते हैं, उनका ज्ञान, उपदेश सदैव जीवित रहता है। पुस्तकें इतिहास बताती हैं। पुस्तकों से ही प्राचीन काल के देश-विदेश की संस्कृति, सभ्यता आदि का पता चलता है। पुस्तक सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध सशक्त माध्यम प्रमाणित होती हैं। वर्तमान समय में जब जीवन-मूल्यों का निरंतर ह्रास हो रहा है, ऐसे में महापुरुषों की पुस्तकें की उपयोगिता अत्यधिक बढ़ जाती है। पुस्तकें अंधकार में प्रकाश की किरण होती हैं।

इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि पुस्तक मेले पाठकों के लिए वरदान हैं। पुस्तकें पाठकों को सहज उपलब्ध रहती हैं। वे अपनी रुचि और आवश्यकता के अनुसार पुस्तकें खरीद सकते हैं। एक विषय पर अनेक पुस्तकें उपलब्ध रहने पर उन्हें पुस्तकों के चुनाव में आसानी रहती है। पुस्तक का विषय, मूल्य आदि की भी पाठक सही जांच-पड़ताल कर लेते हैं। पुस्तक मेलों में होने वाली गोष्ठियों और चर्चाओं से भी पाठकों और नये लेखकों को सीखने को मिलता है।

भारत से ‘मेहरम’ के बगैर 1320 महिलाएं हज यात्रा पर जाएंगी। हज यात्रा के लिए इस बार 370,000 लोगों ने आवेदन किए हैं, जिनमें 1,320 आवेदन उन महिलाओं के हैं, जो ‘मेहरम’ के बिना हज पर जाने की तैयारी में हैं। भारतीय हज समिति ने इन सभी महिलाओं के आवेदन स्वीकार कर लिए हैं। केंद्र सरकार की नई हज नीति के तहत 45 वर्ष या इससे अधिक उम्र की महिलाओं के हज पर जाने के लिए यह पाबंदी हटा ली गई है। ‘मेहरम’ वह शख्स होता है, जिससे महिला की शादी नहीं हो सकती अर्थात पुत्र, पिता और सगे भाई। रविवार को आकाशवाणी पर अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि मेहरम की पाबंदी के कारण बहुत सारी महिलाओं को परेशानी का सामना करना पड़ता था और कई बार तो वित्तीय एवं दूसरे सभी प्रबंध होने बावजूद सिर्फ इसी कारण वे हज पर नहीं जा पाती थीं।

भारत की राष्‍ट्रीयता हिंदुत्‍व है